वचनामृतम् ७५

संवत् १८६ की वैशाख कृष्ण एकादशी के दिन स्वामी श्री सहजानन्द जी महाराज श्री गढडा में दादाखाचर के दरबार में श्री वासुदेव नारायण के मंदिर के आगे नीम के वृक्ष के नीचे पलंग पर विराजमान थे । कंठ में पीले पुष्प का हार शोभित था और उन्होंने समस्त श्वेत वस्त्र धारण किये थे । उनके मुखार विन्द के समक्ष मुनि तथा देश देशान्तर के हरिभक्तों की सभा हो रही थी ।
         
सुराखाचर ने प्रश्न पूछा कि - 'जिसके कुल में भगवान का एक भक्त हो, उसकी इकहतर पीढियों का उद्धार हो जाता है । परन्तु उसके गोत्र में सन्त तथा भगवान के अनेक द्वेषीजन भी होते हैं, तो उनका उद्धार किस प्रकार  होता है ?
         
श्रीजी महाराज बोले कि - 'जैसे देवहुति ने कर्दम ऋषि के साथ पति - भावना रखते हुये संग किया था तो भी कर्दम ऋषि में स्नेह रहने के कारण उसका उद्धार हो गया । तथा मांधाता राजा की पुत्रियों ने सौभरी ऋषि का रुप देखकर विवाह किया था, उन्हें सौभरी में कामवासना से स्नेह था तो उन लोगों का कल्याण ऋषि के समान ही हो गया । अतः जिसके कुल में भक्त उत्पन्न होता है उसके कुटुम्बीजन को ऐसा समझना चाहिये कि हमारा बहुत बडा भाग्य है कि हमारे कुल में भगवान का भक्त हुआ है ।' इस प्रकार भक्त का माहात्म्य समझकर स्नेह रख्खा जाय तो उन सभी कुटुम्बीजनों का कल्याण हो जायगा । जो पितर आदि मरकर स्वर्ग में गये हों और वे भी यदि ऐसा समझें, कि हमारे कुल में भगवान का भक्त हुआ है तो अपना बहुत बडा भाग्य है ।' ऐसा समझकर भगवान के भक्त में स्नेह रखें तो उन पितरों का भी कल्याण हो जाता है । जो भगवान के भक्त के साथ वैर भाव रखने वाले होते हैं उनका कल्याण नहीं होता। जो पुरुष भगवान के भक्तों के साथ ज्यों ज्यों बैर रखता रहता है, त्यों त्यों उसकी बुद्धि भ्रष्ट होती जाती है और शरीर छोडने पर उसे वही नरककुंड प्राप्त होता है जहाँ पंच महापाप करने वाले पडते है । इसलिये भगवान के भक्त में जिसे स्नेह हो वह सम्बन्धी हो या अन्य कोई हो, सबका कल्याण होता है ।
         
नाजा भक्त ने प्रश्न पूछा कि - 'भगवान के भक्तों में एक तो दृढ   निश्चयवाला होता है तथा दूसरा थोडा कम निश्चय वाला हो तो ऊपर से तो दोनों प्रकार के भक्त अच्छे दिखायी पडते हैं । तब दोनों की पहचान किस प्रकार की जा सकती है ?  श्रीजी महाराज बोले कि - 'जिसे आत्मा के स्वरुप का यथार्थ ज्ञान, दृढ वैराग्य तथा भक्ति एवं स्वधर्म का परिपूर्ण ज्ञान हो, उसके निश्चय को   परिपूर्ण समझना चाहिये । यदि इसमें से एक भी बात की कमी रहे तो निश्चय होने पर भी वह माहात्म्य रहित रहता है । जिसमें ये चारों बातें पूर्णरुप से हों तो यह समझना चाहिये कि उसमें माहात्म्य सहित भगवान का निश्चय है ।'
                                       
इति वचनामृतम् ।। ७५ ।।