संवत् १८६ की प्रथम ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को श्री गढडा स्थित दादाखाचर के दरबार में स्वामी श्री सहजानन्दजी महाराज अपने निवास स्थान में विराजमान थे । उन्होंने सर्व श्वेत वस्त्र धारण किये थे । उनके मुखारविन्द के समक्ष अनेक बडे बडे साधु बैठे थे ।
श्रीजी महाराज ने उनके समक्ष वार्ता कही - ''कि क्रोधी, ईष्यालु, कपटी तथा अभिमानी, ऐसे चार प्रकार के जो मनुष्य यदि हरिभक्त हों तो भी उनके साथ हमारा सम्बन्ध नहीं रहता । क्रोध और ईर्ष्या ये दोनों अभिमान के साथ रहते हैं । कामी का तो हमें किसी भी काल में विश्वास नहीं होता कि यह सत्संगी है । कामी तो सत्संग में रहते हुए भी विमुख जैसा रहता है । जो पांच व्रतों के नियमों में किसी प्रकार की कमी नहीं आने देता तथा यदि भगवान कोई कठिन आज्ञा करें और उसकी इच्छा के विरुद्ध अपनी इच्छानुसार कार्य करने का आदेश दें फिर भी उसे जीवन पर्यन्त ग्लानि न हो वही पक्का हरिभक्त है। ऐसे हरिभक्तवर से हमें बिना प्रयत्न के सहज स्नेह हो जाता है । जिसमें ऐसे गुण न हों उससे प्रेम करने जायें तो भी स्नेह नहीं होता । हमारा तो ऐसा स्वभाव है कि जिसके हृदय में भगवान की ऐसी परिपूर्ण भक्ति होती है, उस पर ही स्नेह होता है ।' ।।
इति वचनामृतम् ।। ७६ ।।