वचनामृतम् ७७

संवत् १८६ की द्वितीय ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को स्वामी श्री        सहजानन्दजी महाराज श्री गढडा स्थित दादाखाचर के दरबार में श्री वासुदेव नारायण के मन्दिर के आगे पश्चिमी द्वार के कमरे के बरामदे में पलंग पर विराजमान थे। उन्होंने सर्व श्वेत वस्त्र धारण किये थे । उनके मुखारविन्द के समक्ष मुनियों तथा देश-देश के हरिभक्तों की सभा हो रही थी ।
         
मुनि परस्पर प्रश्नोतर कर रहे थे । एक मुनि अनजाने में भगवान में निश्चय के बल के आधार पर धर्म को झुठलाने की कोशिश करने लगे ।
         
श्रीजी महाराज बोले कि - 'जो भगवान के ज्ञान का आश्रय लेकर धर्म को मिथ्या करने का प्रयास करे उसे असुर समझना चाहिए । भगवान के स्वरुप में तो ऐसे कल्याणकारी अनन्त गुण रहे हैं, जिनका वर्णन श्रीमद् भागवत के प्रथम स्कन्ध में पृथ्वी ने धर्म के समक्ष किया है । अतः जिसे भगवान का आश्रय होता है उसमें तो भगवान के कल्याणकारी गुण आते हैं, तथा जिसे भगवान के स्वरुप का निश्चय होता है उसमें एकादश स्कन्ध में कहे गए साधु के तीस लक्षण आते हैं । जिसमें तीस लक्षण न हो उसे पूरा साधु नहीं समझना चाहिए । जिसे भगवान का निश्चय होता है उसके हृदय में तो प्रभु के कल्याणकारी गुण निश्चित आते हैं । जब प्रभु के गुण सन्त में आते हैं तब वह साधु तीस लक्षणों से युक्त हो जाता है । अतः आज से जो कोई पंचव्रत रुप धर्म को छोडकर ज्ञान या भक्ति का बल ग्रहण करेगा वह गुरुद्रोही और भगवान की आज्ञा का उल्लंघन करनेवाला होगा । जो व्यक्ति धर्म को भंग करने की ऐसी बात करता हो उसे विमुख समझना चाहिए । और ऐसा कहना चाहिए कि तुमने तो असुर का पक्ष लिया है, उसे हम नहीं मान सकते । ऐसा कहकर उस अधर्मी की बात को झुठलाना चाहिए।'
         
बाद में सन्त ने प्रश्न पूछा कि - 'हे महाराज ! कोई भगवान का अत्यन्त दृढ भक्त होता है फिर भी उसे देह-त्याग करते समय पीडा होती है और बोलता भी व्यवस्थित नहीं और दूसरा पक्का हरिभक्त नहीं होता तब भी वह देह छोडने के समय अति समर्थ मालूम होता है और भगवान के प्रताप को अच्छी तरह से समझता हुआ मुख से भगवान की महिमा का गुणगान करते हुए सुखपूर्वक शरीर का त्याग करता है । इसका क्या कारण है ? जो अच्छा होता है उसका अन्त समय अच्छा नहीं दिखता और जो जैसा तैसा सामान्य भक्त हो, उसका अन्तिम समय अच्छा दिखता है । इसका कारण बताइए ?'
         
श्रीजी महाराज बोले कि - 'देश, काल, क्रिया, संग, ध्यान, मन्त्र-दीक्षा तथा शास्त्र ये आठ बातें जैसी हों वैसी ही पुरुष की मति हो जाती है । ये सब बातें यदि शुभ रहें तब तो अच्छी मति होती है और वे अशुभ होती हों तो बुद्धि भी खराब हो जाती है । पुरुष के हृदय में परमेश्वर की माया से प्रेरित चारों युगों (सत्ययुग, द्वापर, त्रेता, कलियुग) के धर्म क्रमशः प्रवृत्त रहते हैं । मृत्यु के समय यदि सत्ययुग का धर्म आजावे तो मृत्यु शोभित हो उठती है तथा त्रेता और द्वापर के धर्म यदि अन्तःकरण में हो तो देहान्त के समय उसकी कान्ति थोडी क्षीण हो जाती है । मृत्यु के समय यदि कलियुग का धर्म आ जाए तो वह विकृत दिखाई पडता है, इस तरह से अन्त समय में जो स्थिति होती है वह काल द्वारा होती है । जागृत, स्वप्न तथा सुषुप्ति नामक जो तीन अवस्थाए हैं उसमें यदि अन्त समय में जाग्रत अवस्था बनी रहती है तो जो पापी हो वह भी बोलते-चालते देह का त्याग करता है । यदि अन्त समय में स्वप्नावस्था बनी रहे तो भगवान का भक्त भी कुछ न कुछ बोलते हुए अपने शरीर का त्याग करता है । अन्त काल में यदि सुषुप्ति अवस्था रहती है तो भगवान का भक्त या विमुख व्यक्ति भी बेहोशी की हालत में मर जाता है । परन्तु उससे शुभ या अशुभ कोई बात बोली नहीं जाती । अन्तकाल में इन तीनों से परे रहकर जो ब्रह्मभाव में लीन होकर अपने शरीर का त्याग करता है वह तो ईश्वर जैसी सामर्थ्य दिखाकर शरीर का त्याग करता है । इस प्रकार भगवान के भक्त ही ब्रह्मरुप होकर ईश्वर जैसी सामर्थ्य दिखाकर शरीर का त्याग करते हैं । अन्य विमुख जीवों से ऐसा हो ही नहीं सकता । इस तरह से अन्त समय में काल के द्वारा शुभ-अशुभ दिखाई पडता है । विमुख जीवों की यदि अन्त समय में जाग्रत अवस्था रहती है और वह बोलते-बोलते शरीर का त्याग कर देते हैं तो उस से उनका कोई कल्याण नहीं हो जाता । विमुख तो अच्छी तरह से शरीर का त्याग करें या बुरी तरह से तो नरक में ही जाते हैं । भगवान के भक्त यदि बोलते बोलते शरीर का त्याग करें अथवा प्रलाप करते हुए या शून्य, मौन भाव से अपने शरीर का त्याग करें तो उनका कल्याण ही होता है । उसमें कोई संशय नहीं है, भगवान के भक्तों को ऐसा समझ लेना चाहिए । भगवान का भक्त हो उसे अन्त समय में स्वप्नादिक अवस्थाओं के योग से बाह्य रुप से पीडाजनक स्थिति लगती हो परन्तु उसके अन्तर में भगवान के प्रताप से आनन्द ही आनन्द रहता है । अतः जो पक्के हरिभक्त होते हैं वे अन्त समय में भले ही बेचैनी की हालत में शरीर का त्याग करें फिर भी उनके कल्याण में लेशमात्र भी संशय नहीं रखना चाहिए ।'   ।।

इति वचनामृतम् ।। ७७ ।।